Thursday, 7 May 2015

क्या होगा तब ?

जब करूंगा अंतिम प्रयाण
ढहते हुए भवन को छोडकर
निकलूँगा जब बाहर
किस माध्यम से होकर गुज़रूँगा ?
वहाँ हवा होगी या निर्वात होगा?
होगी गहराई या ऊंचाई में उड़ूँगा
मुझे ऊंचाई से डर लगता है
तैरना भी नहीं आता
क्या यह डर तब भी होगा
मेरा हाथ थामे कोई ले चलेगा
या मैं अकेले ही जाऊंगा
चारो ओर होगा प्रकाश
या अंधेरे ने मुझे घेरा होगा
मुझे अकेलेपन और अंधकार से भी डर लगता है
क्या यह डर तब भी होगा?
भय तो विचारों से होते हैं उत्पन्न
क्या विचार तब भी मेरा पीछा करेंगे ?
लक्ष्य सुज्ञात होगा
या भटकूंगा लक्ष्यहीन
क्या होगा तब ?
,,,,,,,,,, नीरज कुमार नीर ........  #neeraj_kumar_neer

8 comments:

  1. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

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  2. सुंदर अभिव्यक्ति ।

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  3. अज्ञात का भय सदा उद्विग्न करता है ! कौन जाने कैसी होगी यह यात्रा ! उत्कृष्ट अभिव्यक्ति !

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (09-05-2015) को "चहकी कोयल बाग में" {चर्चा अंक - 1970} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
    ---------------

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  5. एक अनजान रह का भयातुर पथिक है हम सब -सुन्दर प्रस्तुति l

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  6. इस प्रश्न को कोई जान कहाँ पाया है अज तक ... इसलिए जीवन जेना ही अच्छा ...

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  7. Haan yah ek aisa sawal hai jiska uttar Kai dharm dete hain apne apne hisab se. Lekin kaun sach hai ya sab jhoothe hain ye bhi nahi pata. Tab lagta hai Jo prakash ya andhkaar hai uski chinta is jeevan se aage karne par siway rahasya ke siwa kuchh bhi nahi hai.

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  8. बेहतरीन भावाव्यक्ति

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आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत मूल्यवान है. आपकी टिप्पणी के लिए आपका बहुत आभार.

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