Thursday, 11 September 2014

की दवा जितनी मरज़ बढ़ता गया

की दवा जितनी मरज़ बढ़ता गया, 
दोपहर के धूप सा चढ़ता गया।

खूं बहाने की वहीं तैयारियां,
अम्न का मरकज जिसे समझा गया।

साँप हैं पाले हुए आस्तीनों में, 
दूध पीया और ही बढ़ता गया ।

है उसी की ही वजह से आसमां,
राह में जो भी मिला कहता गया।

बढ़ गयी कुछ और ही उसकी चमक, 
सोना ज्यों ज्यों आंच में तपता गया ।
....... 
#नीरज कुमार नीर 
#Neeraj_kumar_neer
#gazal 


10 comments:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 13 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. बढ़ गयी कुछ और ही उसकी चमक,
    सोना ज्यों ज्यों आंच में तपता गया.. सुंदर ग़ज़ल नीरज जी!
    धरती की गोद

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  3. नीरज जी ... भावपूर्ण है हर शेर ... काफिये की कुछ दोष तो समय और अनुभव से दूर होते रहेंगे ...

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    Replies
    1. मान्यवर दोष तो दूर होंगे , पर है क्या ??? :)

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  4. बढ़ गयी कुछ और ही उसकी चमक,
    सोना ज्यों ज्यों आंच में तपता गया ।

    बहुत सुन्दर शेर है यह.

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  5. गजल का ज्ञान थोड़ा कम है मुझे पर रचना बड़ी ही लाजवाब लगी।

    आप भी पहुंचें मेरे ब्लॉग तक
    रंगरूट

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  6. बहुत बढ़िया

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आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत मूल्यवान है. आपकी टिप्पणी के लिए आपका बहुत आभार.

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