Tuesday, 13 May 2014

स्वप्न और सत्य


कभी कभी खो जाता हूँ ,
भ्रम में इतना कि 
एहसास ही नहीं रहता कि 
तुम एक परछाई हो..
पाता हूँ तुम्हें खुद से करीब 
हाथ बढ़ा कर छूना चाहता हूँ.
हाथ आती है महज शून्यता .
स्वप्न भंग होता है ..
 सत्य साबित होता है
क्षणभंगुर.
स्वप्न पुनः तारी होने लगता है.
पुनः आ खड़ी होती हो
नजरों के सामने .. 

नीरज कुमार नीर
चित्र गूगल से साभार 

21 comments:

  1. सुंदर प्रस्तुति...
    आप ने लिखा...
    मैंने भी पढ़ा...
    हम चाहते हैं कि इसे सभी पड़ें...
    इस लिये आप की ये रचना...
    15/05/2013 को http://www.nayi-purani-halchal.blogspot.com
    पर लिंक गयी है...
    आप भी इस हलचल में अवश्य शामिल होना...

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    Replies
    1. आपका हार्दिक धन्यवाद..

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  2. आपकी लिखी रचना बुधवार 14 मई 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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    Replies
    1. आपका हार्दिक धन्यवाद..

      Delete
  3. इतनी अच्छी रचना
    और नयी पुरानी हलचल में
    लगातार
    प्रकाशित हो रही है
    साधुवाद
    सादर

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपका पुनः आभार आदरणीय :)

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  4. ये प्रेम है ...
    गहरा एहसास लिए है रचना ...

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  5. सुन्दर सपने भी सच होते हैं कभी कभी वैसे सपने हमारे मन को शांत करते हैं
    भ्रमर ५

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  6. कोमल प्रेम के एहसास लिये सुंदर रचना ....

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  7. Very beautiful composition indeed. So true also.

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (14-05-2014) को "आया वापस घूमकर, देशाटन का दौर" (चर्चा मंच-1612) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    Replies
    1. आपका हार्दिक धन्यवाद.

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  9. जब प्यार का नशा छाया हो दिल पर तो फिर अपनी सुध बुध कहाँ रहती है ...बहुत खूब!

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  10. बहत ही बढ़िया


    सादर

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  11. काश सब के साथ हो यह। स्वप्न का पुनः लौटना। सुंदर भाव।

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  12. एहसास ही नहीं रहता कि
    तुम एक परछाई हो..
    .
    .very nice

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  13. पाता हूँ तुम्हें खुद से करीब
    हाथ बढ़ा कर छूना चाहता हूँ.
    हाथ आती है महज शून्यता .
    स्वप्न भंग होता है ..
    सत्य साबित होता है
    क्षणभंगुर.
    क्या गज़ब के शब्द लिखे हैं आपने नीर जी ! बहुत बहुत बधाई

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