Monday, 4 November 2013

अब मैं पराभूत नहीं


सांझ ढली 
कुछ टूटा ,
भर गयी रिक्तता.
सब मूंद दिया कसकर. 
अन्दर बाहर अब है, 
एक रस. 
घुप्प अँधियारा. 
दिवस का सब्जबाग, 
छुप गया तमस के आवरण में. 
धवल रश्मि, तुम्हारा सौंदर्य ...
अब है बेमोहक, बेमतलब , अर्थ हीन 
अब मैं पराभूत नहीं,
 नहीं परावश...
#neeraj_kumar_neer 
... नीरज कुमार ‘नीर’ 

11 comments:

  1. वाह ... अब इन सब बातों से ऊपर उठ कर गहरे सत्य के सामना हुआ है अब में परब्भूत नहीं ... बहुत ही लाजवाब भावाव्यक्ति ...

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  2. शुभदीपावली,गोवर्धन पूजन एवं यम व्दितीया श्री चित्रगुप्त जी की पूजन की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें स्वीकार करें

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  3. वाह नीरज जी,
    कमाल की प्रस्तुति.....

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  4. आपकी इस प्रस्तुति को आज की बुलेटिन भाई दूज, श्री चित्रगुप्त पूजा और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  5. छठ पर्व की पावन बधाई
    बहुत सुंदर कविता मेरे भी ब्लॉग पर आयें

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  6. गहराई से निकले भाव. शायद यह अनुभूति किसी ना किसी रूप में सबको होता है.

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  7. भावो का सुन्दर समायोजन......

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  8. बहुत सुन्दर रचना , नीरज भाई
    नया प्रकाशन --: जानिये क्या है "बमिताल"?

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  9. khubsurat rachna / neeraj ji
    my letest post ---Sowaty Pratibha कबीर/ग़ालिब(1-4)

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