Monday, 14 October 2013

रावण, रावण को आग लगाये



कलियुग की कैसी माया देखो
रावण, रावण को आग लगाये
दस आनन थे रावण के 
इनके हैं सौ- सौ सर। 
लोभ, मोह, मद, इर्ष्या ,
द्वेष, परिग्रह, लालच,
राग , भ्रष्टाचार, मद, मत्सर
रहे बजबजा 
इनके भीतर
फिर भी ,
जरा नहीं शर्माए। 
कलियुग की कैसी माया देखो
रावण, रावण को आग लगाये । 
पंडित था रावण ,
था, अति बलशाली ,
धर्महीन हैं ये, हृदयहीन ,
विवेकशून्य, मर्यादा से खाली। 
आचरण हो जिनका राम सा
जनता जिनके राज्य में
भयमुक्त हो, फूले नहीं समाये। 
उन्हें ही हक है, आगे आकर
रावण को आग लगाये । 

... नीरज कुमार ‘नीर’ 
#neeraj_kumar_neer 

आनन : सर , 

15 comments:

  1. बहुत उपयुक्त ! नीरज जी .

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  2. इस पोस्ट की चर्चा, मंगलवार, दिनांक :-15/10/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक -25 पर.
    आप भी पधारें, सादर ....राजीव कुमार झा

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  3. सटीक सुंदर कटाक्ष !
    विजयादशमी की शुभकामनाए...!

    RECENT POST : - एक जबाब माँगा था.

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  4. "रावण, रावण को आग लगाये "......बहुत ही कटु सत्य
    बहुत सुंदर रचना

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  5. बहुत सटीक रचना --"रावण, रावण को आग लगाये "
    अभी अभी महिषासुर बध (भाग -१ )!

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  6. bilkul sach kaha apne. sunder rachana.

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  7. सटीक और अर्थपूर्ण बात

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  8. फिर तो शायद रावण को जलाना ही मुश्किल हो जाए ... आज कहां मिलेंगे राम ... चहुँ ओर बसे जब रावण ...
    सुन्दर अर्थपूर्ण रचना है ...

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  9. This comment has been removed by the author.

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  10. सार्थक सामयिक चिंतन भरी प्रस्तुति
    विजयादशमी की शुभकामनाये!

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आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत मूल्यवान है. आपकी टिप्पणी के लिए आपका बहुत आभार.

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