Sunday, 15 September 2013

आदमी



अपनों को खोके बहुत रोता है आदमी
यादों के जब बोझ को  ढोता है आदमी

रिश्ते जो हो न सके कामयाब सफ़र में
करके याद  उन्हें दामन भिगोता है आदमी

पहले काटता है पेड़,  जलाता है जंगलात ,
एक टुकड़ा छांव को फिर रोता है आदमी .

बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय,
पाता वही वही है जो बोता है आदमी ..

              ......... नीरज कुमार ‘नीर’

13 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [16.09.2013]
    चर्चामंच 1370 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
    सादर
    सरिता भाटिया

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  2. बहुत अच्छी रचना.....
    सच ही है जो हम बोते हैं वही तो काटते हैं ...

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  3. सुंदर रचचना...
    सादर।

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  4. बहुत खूब..सुन्दर रचना।

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  5. बहुत अच्छी रचना.....

    ReplyDelete
  6. बहुत अच्छी रचना.....

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  7. पहले काटता है पेड़, जलाता है जंगलात ,
    एक टुकड़ा छांव को फिर रोता है आदमी


    बहुत सुन्दर शेर कहा है आपने.

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  8. पहले काटता है पेड़, जलाता है जंगलात ,
    एक टुकड़ा छांव को फिर रोता है आदमी ...

    बहुत खूब .. अपने कर्मों के फल को ही भोगता है आदमी ... सुन्दर गज़ल ... नायाब शेर लिए ...

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  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत मूल्यवान है. आपकी टिप्पणी के लिए आपका बहुत आभार.

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