Saturday, 24 August 2013

सुखद स्मृतियाँ


           

दुमहले के ऊँचे वातायन से
हलके पदचापों सहित  
चुपके से होती प्रविष्ट
मखमली अंगों में समेट
कर देती निहाल . 
स्वयं में समाकर एकाकार कर लेती,
घुल जाता मेरा अस्तित्व
पानी में रंग की तरह. 
अम्बर के अलगनी पर
टांग दिए हैं वक्त ने काले मेघ,
चन्द्रमा आवृत है , ज्योत्सना बाधित,
अस्निग्ध हाड़ जल रहा
सीली लकड़ियों की तरह.
स्मृति मञ्जूषा में तह कर रखी हुई हैं
सुखद स्मृतियाँ.....

........ नीरज कुमार ‘नीर’

17 comments:

  1. स्मृतियाँ तो रह जाती हैं, याद सुखद सी लाने को,
    मन को मिले हिलोर और बस बीता समय मनाने को।

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  2. खूबसूरत अभिव्यक्ति, बेजोड़ रचना।

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  3. क्या बात है-

    सादर

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  4. नमस्कार आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (25-08-2013) के चर्चा मंच -1348 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  5. नेटवर्क की सुविधा से लम्बे समय से वंचित रहने की कारण आज विलम्ब से उपस्थित हूँ !
    भाद्र पट के आगमन की वधाई !!
    वाह!वाह!!सुन्दर चीते प्रस्तुतीकरण !!

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  6. बड़ी सुन्दरता से रचा है आपने भावों को. अति सुन्दर कृति.

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  7. अति सुन्दर रचना...
    :-)

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  8. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  9. कोमल भावो की अभिवयक्ति......

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  10. बेहद सुंदर रचना ....

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  11. बहुत सुन्दर प्रस्तुति। ।

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  12. दुमहले के ऊंचे वातायन से
    हलके पदचापों सहित
    चुपके से होती प्रविष्ट...

    सुखद स्मृतियां.....

    अरे वाऽहऽऽ…!
    बहुत सुंदर कविता है...
    नीरज कुमार ‘नीर’ जी

    श्रेष्ठ सृजन हेतु साधुवाद शुभकामनाएं !
    हार्दिक मंगलकामनाओं सहित...
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  13. बेहद खूबसूरत ....
    रोमांचित करती हुयी रचना ...!!

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  14. सुलगती हैं गीली स्मृतियाँ ... तन मन में बस जाती हैं ...
    ये काले मेघ ओर नन्ही बूँदें पल पल आग लगाती हैं ...

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आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत मूल्यवान है. आपकी टिप्पणी के लिए आपका बहुत आभार.

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